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Saturday, September 7, 2013

Annapoorna Ashtakam

Sri Annapurna Ashtakam is a devotional prayer addressed to Goddess Annapoorneshwari, the queen mother of Varanasi. Chanting or singing Sri Annapurna Ashtakam will help one to achieve all ambitions.

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥



योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मैकनिष्टाकरी   
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यकरि तपःफलकरी   काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥


कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥



दृश्यादृश्यविभूतिपावनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रकेलनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥


आदिक्षान्तसमस्तवर्णनिकरी शम्भोप्रियशङ्कारि 
काश्मीरात्रिपुरेश्वरी त्रिनयनि विश्वेश्वरि  शर्वरी ।
स्वर्गद्वारकवाठपाठनकरी   काशिपुरादेश्वरि 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥
६॥

उर्वीसर्वजनेश्वरी  जयकरी माताकृपासागरी  
नारीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी॥॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरुचिरा  दाक्षायणी सुन्दरी
वामा  स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥



चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशी  चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥



क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
सर्वानन्दकरी  सदा शिवकरी विश्वेश्वरीश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥



अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥


 
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥

 

 

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